नक़ाब
हुये जो रूबरू हम,
उनसे पहली दफ़ा .
पहली नज़र में दिल अपना,
हम उनको दे बैठे थे ..
हमे क्या पता था, के वो
झूठ का नक़ाब पहने बैठे थे
झूठ का नक़ाब पहने बैठे थे ...
मासूमियत उनकी देख कर,
हम जाने कहा खो बैठे थे .
उनकी आँखों की नमकीन मस्तियां,
मानो उनमे डूबे कुछ ऐसे थे ..
हमे क्या पता था, के वो
झूठ का नक़ाब पहने बैठे थे
झूठ का नक़ाब पहने बैठे थे ...
आवाज़ उनकी मीठी जैसे,
कोयल की आवाज़ हो .
निगाहें उनकी नशीली जैसे,
कोई पुरानी शराब हो ..
मुश्किल होता हैं उनको भूल पाना,
मुश्किल होता हैं उनकी यादों को,
उनके ख्वाबो, दिल से निकाल पाना ..
मालूम ना था हमे बिल्कुल,
की एक नक़ाब को दिल दे बैठे थे ..
हमे क्या पता था, के वो
झूठ का नक़ाब पहने बैठे थे
झूठ का नक़ाब पहने बैठे थे ...
...To Be Continue ...
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